बुधवार, 3 दिसंबर 2008

फरीद के श्लोक - १३

फरीदा विसु गंदला,धरिए खंड लिवाड़ि॥
इकि राहेदे रहि गए,इकि राधी गए उजाड़ि॥३७॥

फरीदा चारि गवाइआ हंडि कै,चारि गवाइआ संमि॥
लेखा रब मंगेसीआ,तू आंहो केरे कंमि॥३८॥

फरीदा दरि दरवाजै जाऐ कै,किउ डिठो घड़िआलु॥
ऐहु निदोसां मारिऐ,हम दोसां दा किआ हालु॥३९॥

फरीद जी कहते हैं यह संसार तो बहुत ही गंदा है अर्थात जीव को उलझानें वाला है।लेकिन यह जिस तरह हमें नजरआता है वह बहुत ही मोहक और मीठा लगता है।यह ठीक ऐसे ही है जैसे किसी ने विष को चीनी की चासनी मे डुबोकर मीठा कर दिया है और उसे हमें ललचाने के लिए हमारे सामनें परोस दिया हो।इस लिए कई लोग तो इस कोपानें की लालसा में ही तरसते रह गए और जीवन भर रोते-रोते ही बिता कर चले गए और कुछ इसे जीवन भरकमाते रहे ,मेहनत करते रहे।लेकिन अतं मे उन को कुछ भी हाथ नही आया।अर्थात जीवन भर कमा कमा कर भीवह कुछ पा नही सके।

आगे फरीद जी कहते हैं कि तू इस कुछ पाने के लालच में अपने दिन तो इसे पानें की कोशिश मे गँवा रहा है औररात को इस व्यर्थ की भाग दोड़ से हुई थकान के कारण सो कर व्यर्थ गुजार रहा है।क्या कभी तूनें सोचा है कि जबपरमात्मा तुझ से हिसाब माँगेंगा कि मैनें यह मुनुष्य का जीवन तुझे किस काम के लिए दिया था और तू इस मनुष्य के जीवन को पा कर कौन से काम करता रहा है? उस समय तू उस परमात्मा को क्या जवाब देगा?
असल मे फरीद जी इन सवालों को उठा कर हमें समझना चाह रहे हैं कि हमें अपनें जीवन को व्यर्थ के कामों के पीछे भागते हुए,व्यर्थ के पदार्थों को भोगते हुए अपना यह अनमोल जीवन व्यर्थ नही गवाना चाहिए।

अगले श्लोक में फरीद जी कहते हैं कि इस तरह जीवन को बिता कर जब हम अपनी अंतिम घड़ी के करीब पहुँचेगें अर्थात मृत्यू के द्वार पर पहुँचेगें तो वहाँ हमें मृत्यु रूपी घड़ियाल से सामना करना पड़ेगा।यह मृत्यु रूपी घड़ियाल तो उन्हें भी खा जाता है जिन्होनें कभी कोई बुरा काम नही किया है,ऐसे में हम जैसे का क्या हाल होगा जो जीवन भर स्वार्थ के वशीभूत होकर बुरे से बुरा काम करते रहे हैं।अर्थात इस श्लोक में फरीद जी कहना चाहते हैं कि जीवनं के बाद मौत तो हर हाल में आनी ही है।लेकिन जो लोग निर्दोष अर्थात जीवन के उद्देश्य को समझ कर अपना जीवन बिताते है वह तो सुखद मत्यु को प्राप्त होते हैं। लेकिन जो बुरा करते हैं उन का तो बहुत बुरा हाल होता हैं।

हम सभी ने इस तरह की मौतें जरूर देखी है। जब कुछ लोग तो प्रभू भजन करते करते अपनी अंतिम साँस लेते है और कुछ लोग बीमारीयां और नाना प्रकार के कष्ट भोग कर तड़प-तड़प कर मरते हैं।यहाँ फरीद जी इसी का जिक्र कर रहे हैं।

3 टिप्पणियाँ:

राज भाटिय़ा ने कहा…

हमेशा की तरह से एक अच्छी ब्याख्या, बहुत बहुत धन्यवाद

BrijmohanShrivastava ने कहा…

विष वाली बात गोस्वामी जी ने भी कही है ""विष रस भरा कनक घाट जैसे "" बिल्कुल सही है सिकंदर जब गया दुनिया से दौनों हाथ खाली थे / बहुत सही है "तूने जीवन रतन गमायो /बुरा करने वाले का हाल भी बुरा होगा ही /""कर्म प्रधान विश्व कर राखा .,जो जस करहि सो तसु फल पावा ""

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

paramjit ji ,

main choonki adhyatm mein bahut ruchi rakhta hoon , to kya aap mujhe email mein aapke is blog ki samagri ko bhejenge.

dhanyawad.

vijay
vksappatti@gmail.com

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