मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009

फरीद के श्लोक- २१


जां कुआरी ता चाउ,विवाही तां मामले॥
फरीदा ऐहो पछोताउ,वति कुआरी ना थीऐ॥६३॥

कलर केरी छपड़ी,आई ऊलथै हंझ॥
चिंजू बोड़नि ना पीवहि,ऊंडण सधी ढंझ॥६४॥

हंसु ऊडरि क्रोधै पईआ,लोकु विडारणि जाइ॥
गहिला लोकु जाणदा,हंसु ना क्रौधा खाइ॥६५॥

फरीद जी कहते हैं कि जब कन्या कुआरी होती है,तब उसे विवाह की चाह होती है।
लेकिन जब वह विवाह के बंधन में बंध जाती है तो उस समय कई झँझट खडे हो जाते
हैं।तब वह कन्या सोचती है कि इस से तो अच्छा था कि वह कुँआरी ही रह जाती।
लेकिन एक बार विवाह होनें के कारण उस का कुआरापन तो समाप्त हो ही जाता है।ऐसे में
वह कुआरी नही हो सकती।अर्थात फरीद जी कहना चाहते हैं कि जब इन्सान कुआरा अर्थात
दुनीयावी मोह माया से दूर होता है तो उस के मन में उस परमात्मा की चाह पैदा होती है।
लेकिन दुनिया के रंग इतने हैं कि वह उस में डूब जाता है।अर्थात विवाहित होने का भाव
है कि उस संसारी माया में उलझ जाता है।ऐसे में वह उस में फँसता ही चला जाता है।
तब उस के लिए उस माया से निकलना बहुत कठिन हो जाता है।जिस प्रकार एक विवाहित पुरूष
अपनी पत्नी को त्यागनें में असमर्थता महसूस करता है ठीक उसी तरह एक बार माया में उलझनें
के बाद माया को छोड़ना भी इसी तरह कठिन हो जाता है।

अगले श्लोक में फरीद जी कहते हैं कि हँस किसी भी गंदे पोखर में से साफ पानी ही
पीता है और पानी पी कर जल्दी से जल्दी वहाँ से दूर चला जाना चाहता है।अर्थात
फरीद जी कहना चाहते हैं कि जिस प्रकार हँस किसी भी गंदे तलाब ,पोखर आदि में से भी
प्यास लगनें पर अपनी चोंच से साफ पानी ही पीता है ठीक उसी तरह हमें भी इस संसार की
माया के मोह में ना फसँते हुए, अपना ध्यान प्रभु की ओर लगाए रखना चाहिए।वास्तव में
फरीद जी हमें सांकेतिक भाषा में इस बात को समझाना चाहते हैं कि हमें संसार मे कैसे
रहते हुए भी उस प्रभु की भक्ति करनी चाहिए।

फरीद जी आगे कहते हैं कि जब यह हंस किसी अन्नभंडार आदि के समीप बैठता है तो लोग
इसे उड़ा देते हैं।उन्हें ऐसा लगता है कि यह हंस कही उनका अन्न ना खा ले।लेकिन लोग यह
नहीं जानते कि हंस यह सब नही खाता।अर्थात फरीद जी कहना चाहते हैं कि जब कोई फकीर
या प्रभु भक्तिरत व्यक्ति संसार में रहनें लगता है तो लोगों को यह भ्रम होनें लगता है कि यह
धन प्राप्ती के लिए ,दूसरों को धोखा देने के लिए यह सब स्वांग धारण किए हुए है।लेकिन
लोग यह नही समझ पाते कि जो उस परमात्मा के प्यारे होते हैं उन्हें दुनियावी लोभ,मोह
के प्रति किसी प्रकार की आसक्ती नही रह जाती।

4 टिप्पणियाँ:

राज भाटिय़ा ने कहा…

परम जीत जी बहुत सुंदर शलोक ओर उन की व्याखा.
धन्यवाद

vandana ने कहा…

bahut gahre bhav hain paramjeet ji
sach kaha hai duniyavi maya moh mein fanse hum use chodne ko utne aatur nhi hote agar ho jayein to paramtatva ko na pa lein.
hamein bhi hans ki tarah hona chahiye usi ki tarah yeh rag dwesh, maya, mamta,ahankar aadi doshon se khud ko door karke jo santon ki vani hai unka sang hai wo apnana chahiye.

BrijmohanShrivastava ने कहा…

यह भी कहा है कि ""कै हंसा मोती चुगे या लंघन ही मर जावे ""

Aarjav ने कहा…

"जब कन्या कुआरी होती है,तब उसे विवाह की चाह होती है।
लेकिन जब वह विवाह के बंधन में बंध जाती है तो उस समय कई झँझट खडे हो जाते
हैं।तब वह कन्या सोचती है कि इस से तो अच्छा था कि वह कुँआरी ही रह जाती।"
सत्य तथ्य ! " ये जो दुनिया है ये जादू का खिलौना है , मिल जाए तो मिट्टी खो जाय तो सोना है "

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