कंधी वहण न ढाहि,तौ भी लेखा देवणा॥
जिधरि रब रजाइ,वहुण तिदाऒ गंउ करे॥८४॥
फरीदा डुखा दिह गईआ,सूलां सेती राति॥
खता पुकारे पातणी,बेड़ा कपर वाति॥८५॥
लंमी लंमी नदी वहै,कंधी करै हेति॥
बेड़े नो कपरु किआ करे, जे पातण सु चेति॥८६॥
फरीद जी कहते है कि जब नदी बहती है तो वह अपने किनारों पर पड़ने वाली हर चीज को अपने साथ बहा कर ले जाती है।लेकिन इस नदी को भी इस सब कामों का हिसाब देना पड़ता है।यह बात सही है कि यह जो कुछ भी होता है वह सब परमात्मा की मर्जी से होता है।नदी की धार तो उसी दिशा में बहती है जिधर उसे रास्ता मिलता जाता है और यह रास्ता परमात्मा द्वारा ही निश्चित किया हुआ होता है।अर्थात फरीद जी कहना चाहते हैं कि हम जो भी कर्म करते हैं उस का फल हमें ही भुगतना पड़ता है।लेकिन इस के साथ वह यह भी कह्ते हैं कि यह सब कुछ ईश्वर की मर्जी से ही होता है।लेकिन फिर सवाल उठता है कि हम दुख क्यों भोगते हैं?असल मे हमारे दुखो का कारण हमारा अंहकार ही होता है।
फरीद जी आगे कहते है कि इन दुखों से हम सारा दिन दुखी होते रह्ते हैं इस तरह हमारे सारे दिन दुखों के कारण दुखी होते हुए बीतते है,और रात को हम इन्ही की चिन्ता में परेशान होते रहते हैं।किनारे पर खड़ा मल्लाह(गुरु) हमे पुकार-पुकार कर कहता रहता है कि देख!दुखों के भार के कारण तेरा जिन्दगी का बेड़ा डूबने ही वाला है।अर्थात फरीद जी कहना चाहते है कि इन दुखों और दुनियावी समस्याओ में उलझ कर हमे अपनी इस जिन्दगी को बर्बाद नही करना चाहिए।
फरीद जी आगे कहते है कि भले ही यह दुख रूपी लम्बी नदी बह रही है जिस कारण हम दुख भोगते रहते हैं,लेकिन यह दुख रुपी नदी हमारे जीवन को दुखी नही कर सकती यदि हमारे बेड़े को चलाने वाला परमात्मा हो।अर्थात फरीद जी पहले संसार के दुखों के होनें का कारण बताते है कि इस संसार में सुख दुख परमात्मा की मर्जी से ही जीवन में आते हैं और यह दुख हमें अपने अंहकार के कारण ही महसूस होते हैं। लेकिन यदि हम इन दूखो से निजात पाना चाहते हैं तो हमे उस प्रभु का सहारा ही लेना चाहिए।
MAN KEE SHAANTI KAA RAASTAA
Tuesday, April 7, 2009
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