रविवार, 7 जून 2009

फरीद के श्लोक - ३५

फरीदा पिछल राति न जागिउरि जीवदड़े मुइउरि॥
जे तै रबु विसारिआ त रबि न विसरिउरि॥१०७॥

फरीदा कंतु रंगावला वडा वेमुरताजु॥
अलर सेती रतिआ ऐहु सचावां साजु॥१०८॥

फरीदा दुखु सुखु इक करि दिल ते लाहि विकारु॥
अलर भावै सो भला तां लभी दरबारु॥१०९॥

फरीद जी कहते हैं कि यदि तू पिछली रात को नही जागा तो यह जो तेरा जीवन है यह जीवन मरे हुए जीवन के समान गुजर जाएगा।यदि तू उस परमात्मा को भुला बैठा है,तो तू तो भले भूला रह,लेकिन वह परमात्मा तुझे कभी नही भुलाता। अर्थात फरीद जी कहना चाहते है कि इस जीवन में जो दुख के समय भी उस परमात्मा को याद नही करता है ,उसका जीवन व्यर्थ ही जाता है।ऐसे मे कुछ लोग सोचते हैं कि ईश्वर ने हमें भुला दिया है,लेकिन ऐसा कुछ भी नही है।परमात्मा हमे कैसे भूल सकता है।जबकि यहाँ परमात्मा के बिना दूसरा कुछ है ही नही।यह सब परमात्मा ने स्वयं ही अपना विस्तार ही तो किया हुआ है।ऐसे मे हम उस से बाहर कैसे हो सकते हैं,वह हमें कैसे भूल सकता है।

अगले श्लोक में गुरु अर्जुन देव जी फरीद जी की बात को आगे बढाते हुए उस परमात्मा के संबध मे कहते है कि वह परमात्मा बहुत रंगावला अर्थात सभी रंगों से भरपूर,आनंददायी व सदा शातंमयी रहता है,ऐसे मे यदि हम भी उसी के रंग मे रंग जाएं तो हम सभी पापों और विकारों से मुक्त हो कर,उस आन्ण्द मयी अवस्था को प्राप्त हो सकेगें अर्थात उस परमात्मा को पा सकेगे। अर्थात गुरु जी कहना चाहते है कि वह परमात्मा बहुत रगों वाला है,इस लिए हम कैसे भी हो वह हम सभी को अपने अन्दर समाहित कर लेता है।हम पापी हो पुण्यात्मा हो चाहे कोई भी हो।हम जब उस की शरण में जाते हैं तो वह हमें उसी रूप मे स्वीकार कर लेता है।वह परमात्मा शांती स्वरूप है अत: हमे भी वैसा ही बना देता है।

अगले श्लोक मे गुरू अर्जुन देव जी फरिद जी की बात को आगे बढाते हुए कहते हैं कि यह जो सुख और दुख है इसे एक ही करके जानना,जिस से तेरे भीतर के विकार दूर हो सकें।इस तरह उनको स्वीकार करने पर तुझे उस परमात्मा के द्वार मे प्रवेश मिल जाएगा।अर्थात प्रभु कृपा प्राप्त हो जाएगी।अर्थात गुर जी हम से यह कहना चाहते है कि यह जो सुख दुख हैं, वास्तव में यह दो नही हैं,यह सुख दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं,सुख के साथ दुख जुड़ा हुआ है और दुख के साथ सुख।इस लिए जब हम इन्हें अलग अलग मानते हैं तो हमारी तकलीफ शुरू होती है।हम परेशान होते हैं।यदि हम इस बात को समझ ले की सुख और दुख दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं तो हम इस से बच सकते हैं।तब हमें यह समझ आ जाएगा कि ईश्वर का प्रत्येक कार्य हमारे भले के लिए ही होता है।इस तरह उस परमात्मा की मर्जी को स्वीकारने से हम सहज ही उस परमात्मा की कृपा पा सकेगें।उस के दरबार में प्रवेश पा सकेगें।

7 टिप्पणियाँ:

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

बहुत ही ज्ञानवर्धक .

राज भाटिय़ा ने कहा…

अति सुंदर.
धन्यवाद

डा प्रवीण चोपड़ा ने कहा…

बहुत वधिया लिखिया, बाली साहब, जिऊंदे वसदे रहो ---- ऐसे तरां हो सके तो होर वी सूफी संतां दीयां गलां ( बाबा बुले शाह, शाह हुसैन आदि) साडे सबनां नाल सांझीयां करिया करो, बहुत चंगा लगिया।
खुश रहो। बहुत दिनां बाद तुहाडे नाल विचार-वटांदरा हो रिहै।
अच्छा जी, बाकी फेर कदी।

मैंनू वी इक गल याद आ गई ---
रब बंदे दी जात है इक्को,
जिवें कपड़े दी ज़ात है रूं,
रब बंदे विच इंज है वड़िया,
जिवें कपड़े दे विच रूं।
इह गीत मैं वडाली भरावां दा गाया होया अकसर सुनदा रहंदा हां। बहुच चंगा लगदै।

डा प्रवीण चोपड़ा ने कहा…

रब बंदे दे विच ईंज है छुपिया,
जिवें कपड़े दे विच रूं।

सहज साहित्य ने कहा…

परमजीत सिंह जी आपके सभी ब्लॉग देखे । सबकी सामग्री महत्त्वपूर्ण एवं उपादेय है ।

अशोक लव ने कहा…

chintan de eina palaan noon tuhade naal saanjhaa karke changaa lagya .

Nirmla Kapila ने कहा…

बहुत सुन्दर और सार्थक वाणी के लिये धन्यवाद्

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