मंगलवार, 7 जुलाई 2009

फरीद के श्लोक - ३८

फरीद दरवेसी गाखड़ी,चोपड़ी परीति॥
इकनि किनै चालीऐ,दरवेसावी रीति॥११८॥

तनु तुधै तनूर जिउ,बालण हड बलंनि॥
पैरी थकां,सिरि जुलां,जे मूं पिरी मिलंनि॥११९॥

तनु न तपाऐ तनूर जिउ, बालणु हड न थालि॥
सिरि पैरी किआ फेड़िआ,अंदरि पिरी निहालि॥१२०॥

फरीद जी कहते हैं कि फकीरी का रास्ता बहुत मुश्किल लगता है।लेकिन यह फकीरी तभी मुश्किल लगती है जब तुम्हारी फकीरी झूठी होती है,बनावटी होती है।कोई विरला ही होता है,जो इस सब्र को साध ,इस फकीरी के रास्ते चल कर,उस परमात्मा का कृपा पात्र बन जाता है।अर्थात फरीद जी कहना चाहते हैं कि यह फकीरी का रास्ता,प्रभु की कृपा पाने का रास्ता उन लोगों के लिए कठिन हो जाता है जो सिर्फ दिखावा करते हैं।क्युं कि मात्र दिखावा करने से उस प्रभु की कृपा कभी नही पाई जा सकती।असल मे इस दुनिया में ऐसे लोग ही ज्यादा हैं जो इस तरह का दिखावा करते रहते हैं।असली फकीरी वेश धारण करने वाला तो कोई विरला ही होता है।

फरीद जी कहते हैं कि शरीर को तंदूर की तरह तपा देना और अपनी हड्डीयों को अपनी साधना से जलाना।कुछ लोग इसी तरह की साधना करके उस परमात्मा की निकटता पाने की कोशिश में लगे रहते हैं।वे तीरथयात्रा करते है,और उन सभी जगहो पर पहुँचने के लिए कष्ट उठाते रहते है।जहाँ से उन्हें ऐसा लगता है कि हमारे इस तरह के कामों को करने से,हमे उस परमात्मा की कृपा मिल जाएगी।अर्थात फरीद जी कहना चाहते है कि जो ईश्वर की कृपा पाना चाहते है वे किसी भी रास्ते से चल कर उस तक पहुँचने का यत्न करते हैं,चाहे वह रास्त कितना भी कठिन हो।यदि किसी को इन रास्तों से भी प्रभु की प्राप्ती हो जाए तो उसे बहुत सस्ता सौदा जानना।असल मे फरीद जी जीव की, ईश्वर पाने की चाह को ही यहाँ ठीक बता रहे हैं।

फरीद जी आगे हमें समझाते हुए कहते हैं कि इस तरह अपने शरीर को तपाने या अपनी इन हड्डीयों को जलाने की जरूरत नही है और ना ही इधर-उधर भटकने की ही जरूरत है।यदि तुम्हारे अंदर उस परमात्मा की कृपा पानें की ललक पैदा हो गई है तो उस परमात्मा को अपने भीतर ही तलाश करले। वह तो तेरे भीतर ही बैठा हुआ है।अर्थात फरीद जी कहना चाहते है कि जब जीव में उस परमात्मा को पानें की चाह पैदा होती है तो वह किसी भी जतन से उस की कृपा पाना चाहते है। ऐसे वक्त में यदि वह अपने भीतर झांक ले तो वह उसे अपनें भीतर पा कर निहाल हो सकता है।

9 टिप्पणियाँ:

ओम आर्य ने कहा…

बहुत बहुत सुन्दर ........बधाई

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

bahut achcha..

farid ji ki baten manan yogy hai..

is jnyan ke liye aapko dhanywaad

‘नज़र’ ने कहा…

परमानंद की अनुभूति हुई

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चाँद, बादल और शाम

राज भाटिय़ा ने कहा…

फ़रीद जी ने सच मै बिलकुल सही कहा है,
आप का धन्यवाद इन सुंदर विचारो के लिये

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत आभार.

AlbelaKhatri.com ने कहा…

dhnya ho paramjit ji,

bhor ke samay aise amrit vachan padhkar aatma

prasann ho gayi !

__________DHNYAVAAD !

Nirmla Kapila ने कहा…

बहुत दिन बाद अपके ब्लोग पर आने के लिये क्षमा चाहती हूँ धन्य है फरीद जी की वाणी और आपकी कलम का ये सौभाग्य है कि हम जैसे अग्यानी लोगों के लिये ये लिखती है बहुत बहुत धन्य्वाद्

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

प्रस्तुति के लिए धन्यवाद! महापुरुषों का आर्शीवाद हमें यूं ही दीपक दिखाता रहे!

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

गोरख के बहुत क़रीब हैं बाबा फ़रीद.

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