सोमवार, 1 अगस्त 2011

कबीर के श्लोक - ८०

कबीर है गै बाहन सघन घन, छ्त्रपती की नारि॥
तासु पटंतर न पुजै, हरि जन की पनिहारि॥१५९॥

कबीर जी कहते हैं कि जो स्त्री परमात्मा की भक्ति करने वालों की श्रदा पूर्वक पानी भरने की सेवा करती है,ऐसी स्त्री भले ही गरीब हो। लेकिन वह उस स्त्री से श्रैष्ट है जो भले ही छ्त्रपति राजा की स्त्री हो और सभी प्रकार के साधनों से सम्पन्न हो।

कबीर जी कहना चाहते हैं कि परमात्मा की भक्ति करने वालों की सेवा करने से मन में उस परमात्मा के प्रति प्रेम की उत्पत्ति होती है। क्योकि जो उन भक्ति करने वालों की सेवा करता है उस के मन में यह भाव होता है कि वह उसकी सेवा कर रहा है जो उसके प्रिय परमात्मा की भक्तिभाव मे डूबे हुए हैं ऐसे मे परोक्ष रूप से वह भगवान की ही सेवा कर रहा होता है।

कबीर नृप नारी किउ निंदिऐ, किउ हरि चेरी को मानु॥
उह मांग सवारै बिखै कऊ, उह सिमरै हरि नामु॥१६०॥

कबीर जी कहते हैं कि हम उस नृपनारी की क्यों निंदा करते हैं और परमात्मा के सेवको की सेवा करने वाली स्त्री की क्यों बड़ाई करते हैं। उसका कारण है कि नृपनारी तो अपनी मांग सँवारने मे ही अर्थात भोग-विलास मे ही लिप्त रहती है,लेकिन दूसरी स्त्री परमात्मा की भक्ति में लगी रहती है।

कबीर जी कहना चाहते हैं कि जो लोग अपने जीवन को भोग-विलासों को भोगनें में ही गवा देते है ऐसे लोगो का जीवन व्यर्थ ही जाता है। जबकि जो लोग परमात्मा की भक्ति में डूब कर उस परमात्मा के साथ एकरूपता प्राप्त कर लेते हैं उन का जीवन सफल हो जाता है।इसी लिये कबीर जी भोगविलास में लगे लोगों की निंदा करते हैं।यहाँ पर कबीर जी स्त्री शब्द का प्रयोग परमात्मा के भक्त को इंगित करने के लिये कर रहे हैं।

1 टिप्पणियाँ:

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

sunder updesh ...abhar.

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