गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

कबीर के श्लोक - ९१


कबीर जिनहु किछू जानिआ नही.तिन सुख नींद बिहाऐ॥
हमहु जु बूझा बूझना .पूरी परी बलाऐ॥१८१॥

कबीर जी कहते हैं कि जिन लोगों ने अभी तक उस परमानंद के विषय में कुछ भी नही जाना. ऐसे लोगो को कहाँ नींद आती होगी । हमने जो जानने योग्य है उस को पूरी तरह जान लिआ है। इस लिये अब हम परमानंद मे रहते हैं।

कबीर जी कहना चाहते हैं कि यदि यह जान लिआ जाये कि जहाँ भी किसी प्रकार के खोने का या कोई भी भय होता है ऐसा प्रत्येक कर्म जीव को अंतत: दुख व भय ही देता है। ऐसे कर्मों को छोड़ देना चाहिए और  उस परमानंद को पाने की कोशिश करनी चाहिए जिसे पाने के बाद कोई दुख नही रहता।


कबीर मारे बहुत पुकारिआ पीर पुकारै अऊर॥
लागी चोट मरंम की रहिउ कबीरा ठऊर॥१८२॥

कबीर जी कहते हैं कि जब हमें मोह माया सताती है तो हम उसकी पूर्ति करने के लिये अनेकों प्रकार से प्रयत्न करने लगते हैं लेकिन ऐसा करने पर भी हमे समझ नही पडती कि हम ऐसा क्या करें जिस से हमें संतुष्टी प्राप्त हो सके।हम परेशान ही रहते हैं लेकिन कबीर जी कहते हैं कि यदि सही जगह पर चोट की जाये अर्थात सही रास्ता अपना लिया जाए तो हमें ठौर मिल सकती है।

कबीर जी बताना चाहते हैं कि किस लिये हमें सभी काम करते हुए भी संतोष की प्राप्ती नही होती और जीव इस दुख से और अधिक दुखी होता जाता है। उसका कारण मात्र इतना है कि जीव उन कामों से सुख पाने की लालसा करता है जो स्थाई नही होते।जो एक ना एक दिन नष्ट हो ही जानें हैं। इसके विपरीत यदि ऐसा कार्य किया जाये जो सदा स्थाई रहता है अर्थात हमेशा उसी रूप मे रहता है अर्थात उस परमात्मा का ध्यान व भक्ति की जाये तो मन को ठौर मिल जाती है।

3 टिप्पणियाँ:

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

rochak

Anita ने कहा…

परमात्मा की भक्ति व ध्यान से जो आनंद मिलता है वह स्थायी है...बहुत सुंदर भाव!

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत सुन्दर सार्थक श्लोक हैं कबीर जी के। धन्यवाद।

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