शुक्रवार, 9 मार्च 2012

कबीर के श्लोक - ९८


कबीर निरमल बूंद अकास की परि गई भुमि बिकार॥
बिनु संगति इऊ मांनई होइ गई भठ छार॥१९५॥

कबीर जी कहते हैं कि जब बरसात होती है आकाश से जो बूँदें धरती पर गिरती हैं यदि वह कुछ सँवार ना सके तो बेकार ही जाती है। धरती की तपिश में नष्ट हो जाती हैं।यही हाल जीव का होता है। जबकि वह परमात्मा की ही अंश है लेकिन बुरी संगत होने के कारण अपना जीवन व्यर्थ ही गवा देता है।

कबीर जी कहना चाहते हैं कि यदि आकाश की बूँद बंजर धरती पर पड़े तो उस से किसी को कोई फायदा नही होता लेकिन यदि यही बूँद किसी खेत खलिहान पर पड़े तो धरती को लाभ पहुँचाती हैं।इसी तरह मनुष्य के जीवन पर संगत का प्रभाव पड़ता हैं यदि वह अच्छी व साध लोगों की संगत मे रहता है तो अपने जीवन को सँवार लेता है अन्यथा उसका यह जीवन विषय -विकारों से ग्रस्त लोगो की संगत करने के कारण व्यर्थ जी जाता है। कबीर जी यहाँ हमें सगति के प्रभाव के बारे मे बताना चाह रहे हैं।

कबीर निरमल बूंद अकास की लीनी भूमि मिलाऐ॥
 अनिक सिआने पचि गए ना निरवारी जाऐ॥१९६॥

कबीर जी आगे कहते हैं कि धरती उस बूँद को अपने भीतर समाहित कर लेती है फिर वह उससे अलग होना उस बूँद के लिये कठिन होता है। भले ही कितने सयाने हो वह बूँद को धरती में मिलने के बाद पूर्णत: अलग नही कर सकते।

कबीर जी कहना चाहते हैं कि बूँद का धरती  मे समाहित होने के बाद जैसे उन्हें अलग करना कठिन हो जाता है ।ठीक वैसे ही जब कोई सतगुरू की कृपा का पात्र बन जाता है तो ऐसे साधक परमात्मा के रंग मे रंग कर विषय विकारों से दूर हो जाते हैं। फिर कोई भी विकार या बुरी संगति उन्हें नुकसान नही पहुँचा सकती।अर्थात कबीर जी कहना चाह रहे हैं कि जिस प्रकार उपजाऊ व बंजर धरती और बूँद के मिलने से परिणाम निकलते हैं ठीक वैसे ही अच्छी और बुरी संगत करने से प्रभाव पडता है।

12 टिप्पणियाँ:

Anupama Tripathi ने कहा…

सार्थक ,सुंदर प्रयास ...
आभार .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

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veerubhai ने कहा…

अति सुन्दर व्याख्या कबीर की .sang का रंग चढ़ता है कुसंग का भी sat - sng का भी .

Deepak Sharma ने कहा…

सच में सुंदर

पी.एस .भाकुनी ने कहा…

प्रेरक प्रस्तुति...............आभार.

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