सोमवार, 7 जून 2010

कबीर के श्लोक - २४

कबीर परदेसी कै घाघरै, चहु दिसि लागी आगि॥
खिंथा जलि कोइला भई, तागे आंच न लाग॥४७॥

कबीर जी कहते है कि यह जो परदेसी है इस के घाघरे के चारो ओर आग लगी हुई है। इस की जो गोदड़ी है वह तो जल कर कोयला हुई जाती है।लेकिन इस के बीच जो धागा है उसे आँच तक नही लगती।

कबीर जी कहना चाहते  हैं कि यह जीव जो इस जगत मे मुसाफिर है इस की ज्ञान इन्द्रीयों के चारो ओर विषय विकारों की आग लगी हुई है और यह जो हमारा गोदड़ी रूपी शरीर है यह इन विषय विकारों की आग मे जल कर कोयला हुआ जा रहा है अर्थात जीव दुनिया मे मुसाफिर की तरह है और विषय विकारो के आधीन हो कर हम तृष्णा की आग मे जलते रहते है जिस कारण यह शरीर दुख पाता है।लेकिन कबीर जी आगे कहते है कि यह सब तो हो रहा है लेकिन इस शरीर के भीतर जो धागा रूपी हमारी आत्मा है उस पर विषय विकारों का कोई प्रभाव नही पड़ता। अर्थात कबीर जी सांकेंतिक भाषा मे हमे बता रहे है कि यदि विषय विकारों की आग से बचना है तो हमे क्या करना चाहिए।

कबीर खिंथा जलि कोइला भई, खापरु फूट मफूट॥
जोगी बपुड़ा खेलिउ, आसनि रही बिभूति॥४८॥

कबीर जी अपनी बात को आगे ले जाते हुए इस श्लोक मे कह रहे हैं कि यह जो शरीर रूपी गोदड़ी है यह तो विष्य विकारो की आग मे जल कर कोयला हो गई है और यह खप्पर जिस मे जोगी लोग भिक्षादी माँगते हैं यह भी टूट फूट गया है। यदि जोगी इसी तरह करता रहे तो अंत मे कुछ भी हाथ नही आता।

कबीर जी कहना चाहते है कि विषय विकारो की आग मे पड़ कर यह जो जोगी रूपी जीव है, इसने अपने शरीर को तो विषय विकारों से ग्रस्त कर ही लिआ है लेकिन फिर भी यह मन रूपी खप्पर यानी भिक्षा पात्र में और अधिक वासनाओं को ही भरता  जा रहा है जिस कारण इस का यह मन रूपी पात्र भी टूट फूट गया है। लेकिन फिर भी जीव संभलने की बजाय इन्हीं वासनाओं मे रमा रहता है।ऐसा जीव अंत में अपना जीवन व्यर्थ ही गँवा कर यहाँ से जाता है।

5 टिप्पणियाँ:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

Bahut sundar byakhyaa kabir ke doho kee.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

वाह!
कबीर के ये श्लोक तो सदाबहार हैं!

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत आभार परमजीत भाई इस प्रस्तुति के लिए.

डा.सुभाष राय ने कहा…

paramjeetbhai,aj ke samaj ko kabir ke bahut jaroorat hai.itna pakhand,aadambar,dhong phaila hua hai,ise kaun dor karega.chaliye aapkuchh tounki kami pura kar rahe hain.badhai.

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति बाली जी...
आभार्!

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