सोमवार, 14 मार्च 2011

कबीर के श्लोक - ६१

कबीर चरन कमल की मौज को,कहि कैसे उनमान॥
कहीबे कौ सोभा नही,देखा ही परवानु॥१२१॥


कबीर जी कहते हैं कि जो  उस परमात्मा के आथ एकाकार हो चुके हैं,उनके आनंद के बारे मे कुछ कहा नही जा सकता।क्योंकि उस आनंद के बारे में कहने से किसी को कुछ भी पता नही चल सकता।इस आनंद के बारे में तो तभी जाना जा सकता है जब कोई उसी अवस्था मे पहुँचता है।

कबीर जी समझाना चाहते हैं कि मात्र किसी बात को सुनने से या जान लेने से कोई लाभ नही मिलता। यदि उस बारे में जानना है तो उसके लिये स्वयं का अनुभव होना जरूरी है।अर्थात कबीर जी कहना चाहते हैं कि यदि उस परमानंद को पाना है तो उस मे स्वय्म को खोना ही पड़ेगा। तभी हम उस को जान सकेगें।


कबीर देखि कै किह कहौ, कहे न को पतीआऐ॥
हरि जैसा तैसा उही, कहु हरखि गुन गाऐ॥१२२॥


कबीर जी आगे कहते हैं कि जब भी कोई उसे जान लेता है तो उसके बारे में ठीक से कभी कह नही पाता।क्योकि उस परमात्मा के समान कुछ है ही नही जिसका सहारा लेकर उस बारे में समझाया जा सके।परमात्मा जैसा तो सिर्फ परमात्मा ही है।इस लिये हम तो मात्र उस की महीमा को ही गा सकते हैं।

कबीर जी कहना चाहते हैं कि परमात्मा को जानने वाले भक्त भी उसके बारे मे मात्र इशारा भर कर सकते हैं।उसकी महीमा गा सकते हैं। लेकिन किसी को भी उस का अनुभव नही करा सकते।




3 टिप्पणियाँ:

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत सुन्दर व्याख्या\ धन्यवाद।

Anita ने कहा…

कितना अदभुत है परमात्मा !

Manpreet Kaur ने कहा…

क्या बात कहे कबीर जी की ! बहुत ही सुंदर रचना होती है उनकी ! हवे अ गुड डे
प्रणाम,
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