सोमवार, 7 मार्च 2011

कबीर के श्लोक - ६०




कबीर नैन निहारौ तुझ कऊ, स्रवन सुनौ तुअ नाउ॥
बैन ऊचरऊ तुअ नाम जी,चरन कमल रिद ठाउ॥११९॥

कबीर जी कहते हैं कि जब परमात्मा का निवास हमारा ह्र्दय मे हो जाता है तो हमारी ये आँखे हर जगह उसे ही निहारने लगती है और हमारे कान बस उसी का नाम ही सुनने लगते हैं। तब परमात्मा का नाम ही मुँह से निकलता है।

कबीर जी हमे कहना चाहते हैं कि जब कोई परमात्मा के साथ जुड़ जाता है,एकाकार हो जाता है। तब उस जीव द्वारा किये गये सभी कार्य ईश्वरमय ही हो जाते हैं। वह जो भी कार्य करता है या बोलता है,उसमें उस परमात्मा की झलक मौजूद रहती है।

कबीर सुरग नरक ते मैं रहिउ , सतिगुर के परसादि॥
चरन कमल की मौज महि, रहौ अंति अरु आदि॥१२०॥

कबीर जी आगे कहते हैं कि परमात्मा के ह्र्दय मे बसने के बाद  स्वर्ग और नरक की समस्या भी नही रहती और यह सब उस परमात्मा की कृपा से ही होता है। उस परमात्मा के साथ एकाकार होने के बाद जीव सदा के लिए परमानंद की मस्ती मे डूबा रहता है। ऐसे में उसे कोई चिंता नही सताती।

कबीर जी हमे कहना चाहते हैं कि यह सब हमारे यत्न के कारण नही होता बल्कि परमात्मा की कृपा के कारण ही हम उस से एकाकार हो पाते हैं । इस तरह हमारे मन से स्वर्ग और नरक का भय भी समाप्त हो जाता है जोकि हमारे अपने मन की ही उपज होता है।परमात्मा के साथ जुड़ा जीव चिंता रहित जीवन जीता है।

4 टिप्पणियाँ:

anupama's sukrity ! ने कहा…

सुबह -सुबह आपका ब्लॉग पढ़कर सारा दिन आनंदपूर्ण बीतता है -
इश्वर से मिलाने का मार्ग दर्शा कर बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आप .
शुभकामनाएं

Anita ने कहा…

कबीर की अनमोल वाणी उनके अनुभव ज्ञान पर आधारित है, इसलिए हृदय को स्पंदित करती है !

निर्मला कपिला ने कहा…

सुबह का आगाज़ कबीर जी के दोहों से हो तो कितने सौभाग्य की बात है। धन्यवाद बाली जी सुन्दर अनुवाद के लिये।

देवेन्द्र ने कहा…

अति सुन्दर व्याख्या बाली जी । परमानन्द का भी यथार्थ यही तो है कि उस परमपिता परमात्मा से जुडकर जीव सर्व-चिंता-मुक्त हो आनन्दित जीवन जीता है ।

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