शनिवार, 7 मई 2011

कबीर के श्लोक - ६८


कबीर ठाकुरु पूजहि मोलि ले,मन हठि तीरथ जाहि॥
देखा देखी सांग धरि, भूले भटका खाहि॥१३५॥

कबीर जी कहते हैं कि कुछ लोग ठाकुरजी की मूर्तीयां मोल लेकर उन्हे पूजते हैं और कुछ लोग यत्नपूर्वक तीर्थ यात्राओं पर जाते हैं। ये लोग मात्र देखा देखी तथा लोक दिखावे के लिये ऐसा करते हैं। इन से कुछ फायदा नही होता।जीव इन कर्मकांडो मे भटकता रह जाता है।

कबीर जी कहना चाहते हैं कि यदि मन मे किसी कार्य के लिये श्रदा ना हो और वह फिर भी लोकदिखावे के लिये ये सब कर्मकांड करता रहता है जिस से लोग उसे धार्मिक व परमात्मा का भक्त माने, तो ऐसा कोई भी कार्य उस परमात्मा तक पहुँचने मे सहायता नही करता हैं, बल्कि ऐसा करने से जीव भटकाव मे ही पड़ता है।

कबीर पाहनु परमेसुरु कीआ,पूजै सभु संसारु॥
इस भरवासे जो रहे, बूडे काली धार॥१३६॥

कबीर जी आगे कहते हैं कि लोगों ने परमेश्वर को पत्थर बना दिया है और उसी की ये सारा संसार पूजा कर रहा है। जिन लोगो को ये भरोसा है कि ये पत्थर की मूर्तीयां ही सब कुछ हैं ऐसे लोग बहुत गहरे पानी मे ही कहीं खो जायेगें।

कबीर जी समझाना चाहते हैं कि परमात्मा को मात्र पत्थर मान कर पूजने वाले को कोई लाभ नही होने वाला। क्योकि परमात्मा तो सर्वव्याप्त है,सब जगह मौजूद है। ऐसे मे परमात्मा को किसी सीमित दायरे मे बाँध कर हम उसे बहुत छोटा कर देते हैं। ऐसे लोग परमात्मा को नही पा सकते बल्कि उल्टे भटकाव मे पड़ जाते हैं|

2 टिप्पणियाँ:

anupama's sukrity ! ने कहा…

karm par bahumulya updesh kabir ke.....!!
abhar aapka .

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत अच्छी पोस्ट। बाली जी इसकी जब भी पुस्तक छपवायें मेरी प्रति जरूर भेजें बहुत काम की सामग्री है। आभार।

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