शनिवार, 21 मई 2011

कबीर के श्लोक - ७०

कबीर ऐसा जंतु इकु देखिआ, जैसी धोई लाख॥
दीसै चंचल बहु गुना, मति हीना नापाक॥१३९॥

कबीर जी कहते हैं कि मैने ऐसा मनुष्य देखा है जो ऐसा गुणी लगता है जैसे धोई हुई लाख होती है। उसे देख कर ऐसा आभास होता है मानों यह बहुत साफ और सुलझा हुआ आदमी है।देखने पर वह व्यक्ति बहुत उत्साहित व गुणी नजर आता है।लेकिन वास्तव मे वह बुद्धिहीन व मलीन सोच वाला है।

कबीर जी हमे समझाना चाहते हैं कि सभी गुण व समझदारी होने के बाद भी जिस मनुष्य के अंदर उस परमात्मा की याद नही है ऐसा मनुष्य समझदार होते हुए भी समझदार नही हो सकता। क्योंकि अंतत: व्यक्ति अपने गुणों व समझदारी का उपयोग अपनी बुद्धि से ही करता है और ईश्वर से वंचित बुद्धि द्वारा किया गया कोई भी कार्य कभी भी क्ल्याणकारी नही होता।

कबीर मेरी बुधि कऊ जमु न करै तिसकार॥
जिनि इहु जमूआ सिरजिआ सु जपिआ परविदगार॥१४०॥

कबीर जी आगे कहते हैं कि मेरी समझ को यम भी अर्थात जिस के कारण सभी को मृत्यू का भय सताता रहता है वह यम भी मेरा अपमान अर्थात मुझे हतोत्साहित नही कर सकता। क्योंकि मै उस परमात्मा की भक्ति करता हूँ जिसने इस यम को जन्म दिया है।

कबीर जी हमे समझाना चाहते हैं कि यदि मनुष्य सर्वगुण संम्पन्न होते हुए भी परमात्मा से दूर है....उसे भूला हुआ है तो उसके द्वारा किया गया कोई भी कार्य अंतत: क्ल्याणकारी साबित नही होता। जबकि उस परमात्मा से एकाकार हुआ मनुष्य कभी गलत कार्य कर ही नही सकता। अर्थात कबीर जी कहना चाहते है कि उस परमात्मा की भक्ति करने मे ही हमारा भला हो सकता है।

1 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (23-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

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