शुक्रवार, 21 मई 2010

कबीर के श्लोक -२२

को है लरिका बेचई, लरिकी बेचै कोइ॥
साझा करै कबीर सिउ, हरि संगि बनजु करेइ॥४३॥

कबीर जी कह्ते है कि कोई लड़के बेच रहा है और कोई लड़कीयां बेच रहा है। लेकिन कबीर जी कहते है कि हम तो उस के साथ व्यापार करेगें जो ईश्वर के साथ सौदा कर रहा है।

कबीर जी इस श्लोक द्वारा समझाना चाहते है कि इस संसार मे कोई लड़के अर्थात कामादिक विषय विकारों को और कोई लड़कीयों को अर्थात ईष्या द्वैष आदि को दुसरो के लिए इस्तमाल कर रहा है । इस लिए बदले में भी वही सब कुछ पा रहा है। कहने का भाव है कि हम जो संसार को देते हैं वही पाते है। लेकिन कबीर जी कहते हैं कि हम ऐसे लोगो की बजाय ऐसे लोगो से सौदा करना चाहिए अर्थात संग करना चाहिए,  जो उस परमात्मा के नाम सिमरन के बदले ईश्वर को पाना चाहते है ।


कबीर ऐह चेतावनी, मत सहसा रहि जाइ॥
पाछै भोग जु भोगवे, तिन को गुड़ु लै खाहि॥४४॥

कबीर जी कह्ते हैं कि यह चेतावनी है, कहीं ऐसा ना हो कि तू भुलावे मे पड़ा रह जाए।क्योकि अब तक तूने जितने भी विषय-विकारों से ग्रस्त हो कर भोग भोगे हैं, उन का कोई भी लाभ नही मिलने वाला।यह सब तो ऐसे है जैसे किसी दुकान से सामान खरीदने के बाद कोई चुंगा स्वरूप थोड़ा -सा गुड़ खिला देता है।

कबीर जी हमे सचेत करते हुए कहना चाहते है कि बहुत से लोग ऐसा मान कर बैठे हुए कि वे साधन संम्पन हैं, दुनियावी पदार्थो, भोग विलासों का आनंद ले रहे हैं इस लिए उन पर ईश्वर की बड़ी कृपा है।लेकिन कबीर जी सचेत करते हुए कहते हैं कि किसी को ऐसे भुलावों मे नही पड़ना चाहिए।क्योकि ये भोग विलास तुम्हें भ्रम मे डाल रहा है।यह सब तो किसी जन्म मे किए हुए तुम्हारे भलाई के काम के बदले प्राप्त हुआ पदार्थ है।जो कि ठीक ऐसा है जैसे किसी दुकानदार से सौदा खरीदने के बाद दुकानदार चुंगा स्वरूप थोड़ा-सा गुड़ तुम्हे थमा देता है।अर्थात यह सदा रहने वाला सुख नही है।

2 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सार्थक प्रस्तुति!

Smart Indian ने कहा…

सुन्दर व्याख्या, धन्यवाद!

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