शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

कबीर के श्लोक - ५३

कबीर जेते पाप कीऐ,राखे तलै दुराऐ॥
परगट भऎ निदान सभ,जब पूछे धरम राऐ॥१०५॥

कबीर जी कहते हैं कि जीव जितने भी पाप करता है उन्हें वह हमेशा सब से छुपा कर रखता है। लेकिन उन पापों का फल तो समय पा कर प्रगट हो ही जाता है और इन पापो से कैसे बचा जा सकता था यह भी सामने आ जाता है  जब हमारे पापो के संबध  में धर्मराज हमसे पूछता है।

कबीर जी कहना चाहते हैं कि हम जो पाप सब से छुपा कर करते हैं, उन से बचने का उपाय भी हमारे भीतर ही होता है। इन पापों का निदान तभी प्रकट होता है जब हमने अपने अंतकरण रूपी धर्मराज को जाग्रत कर रखा हो।


कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै,पालिउ बहुतु कुटंबु॥
धंधा करता रहि गयिआ,भाई रहिआ न बंधु॥१०६॥

कबीर जी कहते हैं कि उस परमात्मा का ध्यान छोड़ कर जीव  अपने कुटुंब के पालन करने मे ही लगा रहता है। अपने परिवार की पालना करते हुए वह अपना सारा समय गँवा देता है और अंतत: जिन के लिए वह यह सब कर रहा था वे लोग भी उस के साथ नही रहते।

कबीर जी हमे समझाना चाह्ते हैं कि जीव अपने मोह और लालच के कारण पाप मे पड़ता है।इन सब का मूल कारण परमात्मा का ध्यान ना करना ही है।यदि हम उस परमात्मा का ध्यान करते हुए अपने सारे कार-विहार करेगें तो हमे कोई परेशानी नही होगी। लेकिन जीव तो उस परमात्मा को बिसार कर, अपने काम -धंधे मे ही लगा रहता है और जिन के लिए वह ये सब करता है अंतत: वह भी उसे छोड़ कर चले जाते हैं।

2 टिप्पणियाँ:

anupama's sukrity ! ने कहा…

बहुत ज्ञानवर्धक बातें लिखीं हैं -
बहुत अच्छा लगा पढ़कर -
शुभकामनायें

राजीव थेपड़ा ने कहा…

bahut acchha lagaa yahaan aakar......paramjit ji

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