बुधवार, 5 मार्च 2008

गुरुबाणी विचार-६


हरख सोग जाके नही बेरी मीत समान।
कह नानक सुन रे मना मुकत ताहे तै जान॥१५॥

भै काहू को देत न ,न भै मानत आन।
कह नानक सुन रे मना ज्ञानी ताहि बखान॥१६॥

जिहि बिखिया सगली तजी लिओ भेख बैराग।
कह नानक सुन रे मना तिह नर माथे भाग॥१७॥

गुरु जी कहते हैं कि जिस मनुष्य के लिए खुशी और गमी किसी प्रकार से प्रभावित नही कर पाते और शत्रु और मित्र में कोई भेद नही रह जाता।ऐसे मनुष्य को माया से मुक्त मानना चाहिए अर्थात वह माया से मुक्त है।
जो मनुष्य किसी को डराता नही और ना ही किसी से डरता है,गुरु जी कहते हैं ऐसा मनुष्य ही ज्ञानी है।क्योंकि समझदार व्यक्ति जानता है कि परमात्मा का अंश सभी मे समान रुप से मौजूद है।मानव-मानव में ,भेद का कोई कारण नही हो सकता।हमे तो उस भीतर छुपे परमात्मा से व्यवाहर करना है जो सभी मे समान रूप से विराजित है,अत: यदि हमारे व्यवाहर में कोई भेद नजर आए तो निश्चय ही हम उस परमात्मा का अंश सभी में होनें से इंनकार कर रहे हैं।
गुरू जी कहते है कि जिसने काम क्रोध लोभ मोह अंहकार आदि सभी कुछ त्याग दिया है अर्थात जिन में यह विकार अब मौजूद नही रह गए हैं। वही सच्चा वैरागी है। अर्थात वह वैरागी नही है जो घर बार छोड़ कर और वैरागी भेस धारण कर लेता है,जो इन विकार को अभी छोड़ ही नही पाया है।यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि परमात्मा का ध्यान करनें वाले को कुछ छोड़ना नही पड़ता ,वह सब तो अपनें आप ही छूट जाता है।यहाँ पर गुरू जी इसी वैराग के संम्बध के बारे में कह रहे हैं।

1 टिप्पणियाँ:

mehek ने कहा…

sundar vichar,guruvar ko pranam

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