शनिवार, 15 मार्च 2008

गुरुबाणी विचार-१६



स्वामी को ग्रिह ज्यों सदा सुआन तजत नही नित॥
नानक एहि बिधि हरि भजो इक मन होइ इक चित॥४५॥

तीरथ बरत अरु दान करि मन में धरे गुमान॥
नानक निहफल जात तिहि जिउ कुचंर इसनान॥४६॥

सिर कंपिओ पग डगमगे नैन जोति ते हीन॥
कह नानक एहि बिधि भई तौ ना हरि रस लीन॥४७॥


कहा जाता है कि कुत्ता कभी भी अपनें मालिक का घर नही छोड़्ता।भले ही उस का मालिक उसे रूखी-सूखी रोटी देता हो या कभी -कभी रोटी भी ना दे,तो भी कुत्ता कभी मालिक का घर छो्ड़ कर नही जाता।क्योकि कुत्ता अपनें मालिक के प्रति प्रेम के कारण बंधा होता है।वह हर हाल में मालिक का दर छोड़ कर नही जाता।मालिक कई बार कुत्ते को गलती करनें पर मारता भी है,लेकिन कुत्ता मार खा कर भी सदा पूँछ हिलाता मालिक के पीछे चलता रहता है,उस का साथ नही छोड़ता।गुरु जी कहते हैं,हे मनुष्य जिस प्रकार कुत्ता अपनें स्वामी का घर कभी नही छोड़ता,उसी तरह तू भी अपनें मालिक उस परमात्मा का द्वार कभी मत छोड़ना।अर्थात उस परमात्मा का ध्यान एकाग्र हो कर लगाए रहना।सदा उस का भजन करते रहना।
आगे गुरु जी कहते हैं कि कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि तीरथों पर जानें से और दान आदि करनें से हमें प्रभु की कृपा प्राप्त हो जाएगी और यही सोच कर वे इन कार्यों को करते रहते हैं ।लेकिन इस तरह के काम करनें से हम अंहकार से भरते जाते हैं कि हम इतना दान कर रहें हैं,तीरथों के दर्शन कर रहे हैं।क्योकि हम जो कुछ भी करते हैं वह हमारे चित में अंकित होता जाता है,जिस से हमें यह भ्रम हो जाता है कि हमारे यह कार्य कुछ फल अवश्य प्रदान करेगें । लेकिन क्यूँ कि हमारे यह सभी कार्य स्वार्थ से प्रेरित होते हैं इस कारण इस का फल हमें नही मि्ल सकता।प्रभु की भक्ति तो निस्वार्थ भाव से करनें पर ही फलीभूत होती है।इसी लिए गुरु जी कहते हैं कि हमारे द्वारा किए गए यह काम ठीक वैसे ही हैं जैसे हाथी का स्नान करना। क्यूँकि हाथी का स्वाभाव होता है कि पहले तो वह स्नान करता है,फिर स्नान करनें के बाद अपने ऊपर मिट्टी ड़ाल लेता है।
यदि हम हमेशा इसी तरह कार्य करते रहे तो एक दिन हम बूढे हो जाएंगें। बूढा होनें पर हमारा शरीर कमजोर हो जाता है,सिर काँपनें लगता है,पैर लड़खड़ानें लगते है,आँखों की ज्योति भी कमजोर पड़ जाती है।ऐसे समय में प्रभु का ध्यान करना बहुत कठिन होता है।क्यूँ कि शरीर के कमजोर होनें के कारण कई रोग हमें घेर लेते हैं।इस लिए शरीरिक पीड़ा के कारण हम उस प्रभु का ध्यान कैसे करे सकेगें ।रह रह कर तो हमारा ध्यान अपनें शरीर के कष्टों की ओर ही जाएगा। इस लिए गुरु जी कहते हैं कि ऐसे में तो हम उस प्रभु का ध्यान नही कर पाएगें।अत:ह मे समय रहते ही उस कार्य में लग जाना चाहिए।


2 टिप्पणियाँ:

सतीश सक्सेना ने कहा…

आज तो गुरुद्वारे आ गया बाली साहब ! आनंद आ गया

youmania ने कहा…

aap bahut accha likhte hai paranjit ji,aise hi likhte rahiye.

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